मां शाकंभरी आदिशक्ति दुर्गा का ही एक करुणामयी और पोषण करने वाला स्वरूप हैं। देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण के अनुसार जब पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा, अन्न, फल और जल समाप्त हो गया, तब माता ने शाक अर्थात साग, फल, कंद-मूल और वनस्पति उत्पन्न कर समस्त सृष्टि का पालन किया। इसी कारण उनका नाम शाकंभरी पड़ा, अर्थात जो शाक से संसार का भरण-पोषण करती हैं। वे मां दुर्गा का ही अवतार हैं, जिनका प्राकट्य जीवनरक्षा और लोककल्याण के लिए हुआ।
मार्गशीर्ष से पौष के संधिकाल में आने वाली यह नवरात्रि विशेष रूप से मां शाकंभरी को समर्पित होती है। शास्त्रों में इसे गुप्त और फलदायी नवरात्रि माना गया है। इस काल में देवी की आराधना करने से केवल भौतिक नहीं बल्कि जीवन की मूल आवश्यकताओं से जुड़ा संतुलन भी प्राप्त होता है।
28 दिसंबर से आरंभ होने वाली यह नवरात्रि साधकों और गृहस्थों दोनों के लिए विशेष मानी जाती है।
मां शाकंभरी की पूजा कौन करता है
मां शाकंभरी की पूजा वे लोग विशेष रूप से करते हैं जो जीवन में बार-बार अभाव, आर्थिक अस्थिरता, भोजन या आजीविका से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे होते हैं। किसान, व्यापारी, गृहस्थ, साधक और वे परिवार जिन पर लंबे समय से दरिद्रता या अकाल जैसी स्थिति का प्रभाव रहा हो, श्रद्धा से इनकी उपासना करते हैं। तांत्रिक और साधना मार्ग पर चलने वाले साधक भी इस नवरात्रि में मां शाकंभरी की आराधना करते हैं, क्योंकि यह देवी जीवन को स्थायित्व देने वाली मानी जाती हैं।
मां शाकंभरी की आराधना के लाभ
मां शाकंभरी की साधना से अन्न, धन और संसाधनों की कमी दूर होती है। घर में भोजन, सुख-सुविधा और समृद्धि का प्रवाह बना रहता है। लंबे समय से चला आ रहा आर्थिक संकट धीरे-धीरे शांत होने लगता है। परिवार में रोग, कमजोरी और कुपोषण से जुड़ी समस्याओं में भी राहत मिलती है। मानसिक रूप से व्यक्ति को संतोष, स्थिरता और जीवन के प्रति विश्वास प्राप्त होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मां शाकंभरी की कृपा से प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है और जीवन पुनः हरियाली से भर उठता है।
मां शाकंभरी केवल एक देवी नहीं, बल्कि यह स्मरण हैं कि जब संसार भटक जाता है, तब शक्ति स्वयं माता बनकर जीवन का पालन करती है। 28 दिसंबर से आरंभ होने वाली यह नवरात्रि के 3 जनवरी को मां शाकंभरी जयंती उनके उसी करुणामयी स्वरूप को अनुभव करने का श्रेष्ठ अवसर है।